सीएसआईआर–आईएचबीटी टीम ने मिजोरम में किसानों को दिया लो-चिलिंग सेब व मशरूम प्रशिक्षण

उज्जवल हिमाचल । पालमपुर

सी.एस.आई.आर- हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान, पालमपुर, हिमाचल प्रदेश की टीम ने 2 और 4 फरवरी, के दौरान आइजोल, मिजोरम का दौरा किया। यह दौरा भारत सरकार के जैवप्रौद्योगिकी विभाग (डी.बी.टी) द्वारा वितपोषित परियोजना के अंतर्गत चल रही शोध एवं प्रसार गतिविधियों की निगरानी के लिए किया गया था। वैज्ञानिकों की टीम ने मिजोरम के आइजोल जिले के डर्टलांग और सिहफिर गांवों में किसानों के साथ बातचीत की व आइजोल जिले के किसानों को अन्ना और डोरसेट गोल्डन किस्म के लो चिलिंग सेब के पौधे बांटे।

सेब, शिटाके मशरूम, और सुगंधित और औषधीय पौधों पर ट्रेनिंग-कम-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया जिसमें 25 से ज़्यादा आदिवासी किसानों, राज्य अधिकारियों, विद्वानों और वैज्ञानिकों ने प्रतिभागिता की, जो इन फसलों में आय के वैकल्पिक स्रोतों के रूप में बढ़ती रुचि को दर्शाता है। इन कार्यक्रमों में सी.एस.आई.आर – आई.एच.बी.टी की किसान-केंद्रित प्रौद्योगिकी और उत्तर पूर्व राज्य के संबधित विभागों, विश्वविद्यालयों और जमीनी स्तर के संस्थानों के साथ तालमेल के माध्यम से उनके प्रक्षेत्र स्‍तर पर लागू करने पर प्रकाश डाला, जो आय उपार्जन के वैकल्पिक विकल्पों के रूप में इन फसलों में बढ़ती रुचि को दर्शाता है।

सी.एस.आई.आर–आई.एच.बी.टी के निदेशक डॉ. सुदेश कुमार यादव ने बताया कि यह परियोजना चार साल से सफलतापूर्वक चल रही है और इसमें लगातार प्रगति हो रही है, इससे किसानों की आजीविका में सुधार की सम्भावना है। उन्होंने कहा कि मिज़ोरम में यहाँ के मौसम और उपजाऊ मिट्टी के कारण बागवानी फसलों, मशरूम और सुगंधित एवं औषधीय पौधों की अपार संभावनाएँ हैं। उन्होंने कहा कि सही किस्मों को बेहतर खेती और प्रसंस्‍करण प्रौद्योगिकी के साथ अपनाने से किसानों की आय में बढ़ोतरी तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था मज़बूत हो सकती है। संस्थान के मुख्य वैज्ञानिक एवं परियोजना प्रमुख डॉ. राकेश कुमार ने पैदावार और गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए, खासकर बारिश पर निर्भर और कम उपजाऊ क्षेत्रों में, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित रोपण सामग्री, बेहतर खेती पद्धति और खेतों में प्रयोगात्‍मक प्रशिक्षण के महत्व पर ज़ोर दिया।

यह दौरा उत्तर पूर्वी क्षेत्र में सी.एस.आई.आर–आई.एच.बी.टी की भागीदारी को मज़बूत करने और मिज़ोरम की कृषि-जलवायु परिस्थितियों के हिसाब से कम ठंड वाली सेब की किस्मों, शिटाके मशरूम और सुगंधित एवं औषधीय पौधों में टिकाऊ खेती, मूल्‍यवर्धन और उद्यमिता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। संस्थान का ‘मिसटिक’ के साथ यह सहयोग उत्तर पूर्व में टिकाऊ, टेक्नोलॉजी-आधारित खेती की ओर एक बड़े बदलाव को दिखाता है।