Saturday, March 6, 2021
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चीन की कुटिल वैक्‍सीन डिप्‍लोमेसी के खिलाफ भारत ने खींची लंबी रेखा

उज्जवल हिमाचल। नई दिल्‍ली

चीन की कुटिल वैक्‍सीन डिप्‍लोमेसी की काट के लिए भारत ने कमर कस ली है। भारत अपनी इस छवि के साथ कि वह विश्‍व को सस्‍ती दवाओं की आपूर्ति करने में अग्रणी रहा है, कोविड-19 संकट से निपटने के लिए दुनिया भर में टीकों की आपूर्ति के लिए तैयार है। पड़ोसी देशों के अलावा ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका भी कोविड-19 संकट से निपटने के लिए टीके लगाने के लिए भारत पहुंच रहे हैं। इक्वाडोर के दूत भारत बायोटेक के कोविड -19 वैक्सीन के तीसरे चरण के परीक्षण में भाग लेने वाले पहले दूत बन गए। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्‍या है वैक्‍सीन डिप्‍लोमेसी। क्‍या है चीन की कुटिल वैक्‍सीन डिप्‍लोमेसी। क्‍या है भारत की तैयारी।

कोरोना महामारी के खतरों से बचने के लिए दुनिया भर में वैक्सीन के लिए परीक्षण हो रहे हैं। इसके अलावा इसे हर शख्स के पास पहुंचाने को लेकर नीतियां तैयार की जा रही हैं। ऐसे में एक नई डिप्लोमेसी सामने आई है। वैक्‍सीन के मामले में भारत अपने पड़ोसी देशों को सहयोग करेगा। वैक्‍सीन के विकास में भारत, बांग्लादेश और म्यांमार सहयोग करेगा। विदेशी मामलों के मंत्रालय से शीर्ष अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों ने बांग्लादेश और म्यामांर की सरकार के साथ वैक्सीन के संयुक्त उत्पादन, वितरण और आपूर्ति पर बातचीत की।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि पड़ोसी देशों के साथ अब तक दो ट्रेनिंग मॉड्यूल आयोजित हो चुके हैं। इसमें करीब 90 स्वास्थ्य विशेषज्ञ और वैज्ञानिक हिस्सा भी ले चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस योजना को विस्तार दिया जाएगा। सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली में कहा था कि वैक्सीन की आपूर्ति को लेकर भारत सभी देशों को कोल्ड चेन और स्टोरेज क्षमता बढ़ाने में मदद करेगा। परीक्षण के आधार पर भारत अन्य देशों के साथ क्लिनिकल ट्रॉयल, वैक्सीन डेवलपमेंट के लिए कैपिसिटी बिल्डिंग और फिर उसके उत्पादन व आपूर्ति के लिए सहयोग करेगा।

17-19 अक्टूबर एक डेलीगेशन ने बांग्लादेश जाकर वैक्सीन के वर्तमान चरण को लेकर बातचीत किया। दोनों पक्षों में बांग्लादेश में क्लिनिकल ट्रॉयल की रूपरेखा को लेकर बातचीत हुई। म्यामांर के साथ इस मामले में वर्चुअल इंट्रैक्शन हुआ है। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्‍ठ अफसर ने बताया कि भारत दुनिया भर की 60 फीसद से अधिक वैक्सीन का उत्पादन करेगा और एक बार वैज्ञानिकों की मंजूरी मिल जाए, तो इसे बड़े स्तर पर तैयार किया जाएगा। इसके बाद इसे पहले पड़ोसियों को आपूर्ति की जाएगी और फिर बाकी देशों को।

बांग्‍लादेश ने भारतीय वैक्‍सीन के क्लिनिकल ट्रायल पर अपनी सहमति जताई है। हालांक‍ि, चीन ने सिनोवैक बॉयोटेक लिमिटेड द्वारा बनाए गए कोरोना वैक्‍सीन के ट्रायल को लेकर बांग्‍लादेश को वित्‍तीय सहायता देने की पेशकश की थी, लेकिन बांग्‍लादेश ने इसे ठुकरा दिया। बांग्लादेश की कंपनी बेक्सिमो फॉर्मा ने भारत की सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ प्रॉयोरिटी बेसिस पर वैक्सीन सप्लाई को लेकर समझौता हुआ है।

इस बाबत हाल में भारत-मैक्सिकों के बीच हाईलेवल की बैठक हुई थी। इसमें दोनों देशों ने वैक्सीन डेवलपमेंट को लेकर अपने नोट्स एक्सचेंज किए। भारत ने फार्मा के प्रॉक्यूरमेंट के मैक्सिको सरकार को विचार करने को कहा है। इंडिया-मैक्सिको प्रोग्राम ऑफ कॉरपोरेशन 2020-2022 के तहत वैक्सीन और महामारी प्रबंधन पर वर्चुअल मुलाकात होने की बात कही गई है। कोरोना वैक्‍सीन को लेकर एक बार फ‍िर चीन की फ‍ितरत सामने आई है। चीन की चाल रही है कि वह सस्‍ते लोन देकर गरीब देशों को कर्ज के जाल में फंसाता है, अब कोरोना वायरस की वैक्सीन देने के नाम पर चीन डर्टी डिप्‍लोमैसी कर रहा है।

चीन आर्थिक रूप से कमजोर देशों पर वैक्सीन डिप्‍लोमैसी का इस्तेमाल हथियार की तरह कर रहा है। चीन गरीब मुल्कों को वैक्सीन की पेशकश कर रहा है और उसे खरीदने के लिए लोन भी दे रहा है। खासतौर से इसमें लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देश शामिल हैं। ड्रैगन इन गरीब देशों को कर्ज के रूप में एक बिलियन डॉलर यानी 700 करोड़ रुपए सिर्फ चाइनीज वैक्सीन खरीदने के लिए देगा।

दरअसल, लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देशों में कोरोना को लेकर हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं। इन देशों में मौत की दर भी काफी ज्यादा है। कोरोना महामारी के दौर में चीन ये दिखाना चाहता है कि संकट की घड़ी में उसे दूसरे देशों का पूरा ख्याल रख रहा है। चीन की यह कोशिश है कि मेड इन चाइना वैक्सीन कंबोडिया, लाओस, थाईलैंड, म्यांमार और वियतनाम जैसे देशों तक भी पहुंचे। दूसरी ओर अफ्रीका, पूर्वी यूरोप के कुछ देशों के साथ नेपाल भी चीन के टेरगेट पर हैं।

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