हिमाचल सरकारों द्वारा सेवानिवृत्त कर्मचारियों के साथ संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन और आर्थिक अन्याय

उज्ज्वल हिमाचल। धर्मशाला

हिमाचल प्रदेश के 43,000 सेवानिवृत्त कर्मचारियों, जिन्होंने 1 जनवरी 2016 से 1 जनवरी 2022 के बीच अपनी सेवाएं समाप्त कीं, को छठे वेतन आयोग की संस्तुतियों के तहत संशोधित ग्रेच्युटी, कम्यूटेशन, और अर्जित अवकाश नकदीकरण के बकाया एरियर्स का भुगतान आज तक नहीं किया गया। यह न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और वर्तमान मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकारों द्वारा संवैधानिक मर्यादा को तार-तार करने का घृणित कृत्य है। कांगड़ा से जारी एक प्रैस रिलीज़ में पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के राज्य वरिष्ठ उपाध्यक्ष कल्याण भंडारी ने कहा कि दोनों मुख्यमंत्रियों ने इस मामले में हैरतअंगेज रिकॉर्ड स्थापित किए, जो निंदनीय और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के वित्तीय लाभों को रोककर एक स्थापित विधि-सम्मत परंपरा को तोड़ दिया, जिसमें सेवानिवृत्ति के लाभों का अविलंब एकमुश्त भुगतान सुनिश्चित किया जाता था। उनकी सरकार ने संशोधित वेतनमान के लिए करोड़ों रुपए का प्रावधान किया था, लेकिन इन कर्मचारियों के बकाया एरियर्स को नजरअंदाज कर उनके साथ विश्वासघात किया। यह कदम न केवल वरिष्ठ नागरिकों के प्रति असंवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की कमी को भी उजागर करता है। वहीं दूसरी ओर वर्तमान मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी इस मामले में कोई राहत नहीं दी।

उन्होंने तो संवैधानिक अनुचितता का परिचय देते हुए विधानसभा में वित्तीय वर्ष 2024-25 के बजट भाषण में बकाया एरियर्स के चरणबद्ध भुगतान को प्रस्तावित किया था, लेकिन आज तक इस प्रस्ताव को लागू नहीं किया गया। यह वादाखिलाफी न केवल पेंशनर्स के साथ धोखा है, बल्कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के निर्देशों की अवमानना भी है, जिसने 2016 से लागू संशोधित वेतनमान के एरियर्स के भुगतान का आदेश दिया था। इस वित्त वर्ष के बजट भाषण में मुख्यमंत्री ने तीन प्रतिशत महंगाई भत्ते की किस्त जून माह से अदा करना प्रस्तावित किया था और जिसका शंखनाद हिमाचल दिवस के मुकद्दस मौके पर भी जोर शोर से किया गया मगर उसे आजदिन तक अधिसूचित नहीं किया। सुक्खू सरकार की यह निष्क्रियता संवैधानिक मर्यादा को ताक पर रखने का स्पष्ट उदाहरण है।

भंडारी ने आगे कहा कि इन दोनों सरकारों का रवैया न केवल आर्थिक व्याभिचार का प्रतीक है, बल्कि यह संवैधानिक संस्थाओं और सेवानिवृत कर्मचारियों के हक के प्रति घोर उपेक्षा को भी दर्शाता है। अब विधानसभा सत्र में भाजपा और कांग्रेस में नूरा कुश्ती जारी है। कभी प्रतिपक्ष कर्मचारियों और पेंशनर्स की पैरवी प्रदर्शित कर वॉकआउट करता है तो वहीं सत्तापक्ष द्वारा प्रैस कांफ्रेंस कर विपक्ष को दोष देकर लोगों को बेवकूफ बनाने का असफल प्रयास किया जा रहा है। जबकि दानों दलों की सरकारों द्वारा करोड़ों रुपए के बकाया एरियर्स का बोझ इन बुजुर्ग कर्मचारियों पर डाला गया है। ये कर्मचारी, जिन्होंने राज्य की प्रगति के लिए अपने जीवन का स्वर्णिम समय समर्पित किया, आज अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सरकारों का यह रवैया इन वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान और गरिमा पर हमला है। हिमाचल प्रदेश के सेवानिवृत्त कर्मचारी और उनके समर्थक यह मांग करते हैं कि इन 43,000 सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बकाया एरियर्स, जिसमें संशोधित ग्रेच्युटी, कम्यूटेशन, और अर्जित अवकाश नकदीकरण शामिल हैं, का तत्काल एकमुश्त भुगतान हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप किया जाए तथा सरकार बकाया भुगतानों की स्थिति पर विस्तृत जानकारी सार्वजनिक कर संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करे और कर्मचारियों के हकों का गरिमापूर्ण ढंग से सम्मान सुनिश्चित करे।

पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की सूबे की प्रबुद्ध जनता और सभी कर्मचारी संगठनों से अपील है कि वे इस संवैधानिक और आर्थिक अन्याय के खिलाफ एकजुट हों। यह केवल 43,000 कर्मचारियों का सवाल नहीं, बल्कि पूरे राज्य की प्रशासनिक विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक मूल्यों का मामला है। यदि सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से भागती रहीं, तो कर्मचारी और जनता सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।