जंगली में काटी लकड़ी खराब होने की कगार पर

एसके शर्मा। बड़सर

बड़सर उपमंडल के तहत आने वाले जंगलों में लगभग 7800 स्लीपर चीड की लकड़ी ऐसे पडे़ हुए हैं, जिससे बड़सर के बीटों में करोड़ों की चीड़ की इमारती लकड़ी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। विभाग ने लकड़ी का कटान तो करवा लिया है, लेकिन अब लकड़ी जंगलों से उठाई नहीं जा रही। अगर समय रहते इस लकड़ी को जंगलों से नहीं उठाया गया, तो फायर सीजन में आगजनी जैसे हादसा पेश आने की सूरत में यह सुखी लकड़ी खत्म हो जाएगी।

ऐसी सूरत में इस सरकारी संपति का कौन जिम्मेदार होगा। बताते चलें कि उपमंडल बड़सर के तहत आने वाले क्षेत्रों में बड़सर, बणी, सलौनी, बिझड़ी चकमोह सहित अन्य बीटों में विभाग ने लकड़ी का कटान तो करवा लिया है। गर्मी में जंगलों में अग्निकांड की घटनाएं होती हैं। अगर समय रहते लकड़ी नहीं उठाई, तो विभाग को लाखों का नुकसान हो सकता है। गौर रहे कि दिसंबर, जनवरी, फरवरी और मार्च में शामलात भूमि पर सूखे पेड़ों का विभाग ने ठेकेदारों से कटान करवाया है।

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अबकी बार कोरोना महामारी के चलते लाखों रुपए खर्च करके भी लकड़ी को जंगलों से उठाने का रास्ता नजर नहीं आ रहा है। इससे पूर्व वन विभाग के नियमानुसार 31 मार्च तक जंगलों से काटी गई लकड़ी को वहां से उठाना होता है, लेकिन इस बार लॉकडाउन के चलते वन विभाग में कार्यरत लगभग 27 कांट्रेक्टर अभी तक जंगलों से लकड़ी नहीं उठाने के चलते मझधार में फंसे आस लगाए बैठे है कि कब लॉकडाउन हटे व जंगल में कटी हुई लकड़ी की पहुंच विभाग के डिपूओं में दे सकें।

वैसे भी बड़सर विस क्षेत्र के जंगलों में चीड़ के पेड़ ज्यादा हैं। सरकार, वन विभाग और ठेकेदार को इनसे भी आय भी होती है। उधर, वन विभाग आरओ बड़सर दलेल सिंह ने बताया कि प्रदेश में लॉकडाउन के चलते ये समस्या आई है। उन्होंने कहा कि अगर हाल ठीक रहा तो गर्मियों से पहले लकड़ी को उठा लिया जाएगा।